Thursday, September 29, 2016

नाश

नाश


ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था,
जब टूट गया था हर बंधन, हर रिश्ता, हर नाता,
ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था।
उन पलों की याद से दहलती ये ज़मीन, ये आसमां,
ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था।

हर साँस तब शोक में डूबी हुई पुकार थी,
इंसान-इंसान का दुश्मन था, हर हाथ में तलवार थी,
दिल में नफरत की खड़ी एक अनदेखी दीवार थी,
जीते हिन्दू या मुसलमान वो इंसानियत की हार थी,
खून की नदियाँ बहीं पर किसी को उससे वास्ता क्या था,
ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था।

गगन पे भी नफरत के बादल छाए थे चारों पहर,
हर साँस से था पूछा जाए, उसका धर्म, उसका शहर,
भारत के थे दो टुकड़े हुए,
हिंदुस्तान और पाकिस्तान,

ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था। 

दीपावली


हर चेहरे पे जब मुस्कान हो,
लहराते खेत-खलियान हों,
असत्य पर विजय पाकर अयोध्या लौटे राम हों,
रोशनी से जग मग जब ये सारा आवाम हों,
हर दुख से, हर गम से, जब इस ज़िंदगी का उत्थान हो,
तब यह त्योहार दीपावली अंजाम हो ।


जज़्बा

आसमान पे शहद बिखेरोगे तो बादलों से चाशनी की बारिश होगी,
सितारों पे पलंग जमाओगे तो चाँद पे चारपाई की नवाज़िश होगी,
नदियों में गोता लगाओगे तो महासागर की लहरों पे तैरना आएगा,
पहाड़ियों पे बेबाक चड़ोगे तभी तो पर्वत पे परचम लहराएगा,
उठो, दौड़ो, भागो, ये ज़िंदगी जीने के लिए है,
चाहे मीठा दूध हो, या कड़वी दवाई, ये दो घूंट पीने के लिए हैं,
सच्चाई की राह पर, दिलों की चाह पर,
बस चलते रहो, बढ़ते रहो,
मुश्किलों से लड़ते रहो,
वैसे भी तुम राह के मुसाफिर हो मंज़िल के नहीं,
गर इस राह में अपनों का साथ मिले तो मंज़िलों पे थमोगे नहीं,
चाहोगे ऐसे सफर का अंत कभी हो नहीं।







छह चालिस की मेट्रो

आजा तुझे छह चालीस की मेट्रो से चाँद पे ले चलूँ,
सुना है आज वहाँ कोई फाउंटेन शो है,
पर जल्दी तैयार हो जा रेडियो पे कहा है के रास्ते में ट्रेफिक स्लो है।

आज लोगों को आजा चाँद की वो साइड दिखाते हैं जो धरती से नहीं दिखती,
ना-ना लाइटिंग नहीं लगानी वहाँ, तू बस चल,
तेरे चहरे में चाँद को चमकादे जो ऐसा गलो है,
पर जल्दी तैयार हो जा रेडियो पे कहा है के रास्ते में ट्रेफिक स्लो है।

वो जो धरती से चाँद पे दाग दिखते हैं ना,
वो असल में वहाँ की खाड़ियाँ और पहाड़ियाँ हैं,
आजा आज वहाँ चल के कूदेंगे,
ना-ना अपने को बस चलना है कूद अपने आप लगेगी,
दरसल चाँद पे धरती से ग्रेविटी लो है,
पर जल्दी तैयार हो जा रेडियो पे कहा है के रास्ते में ट्रेफिक स्लो है।




कुर्बानी


खून में उबाल लाने वाली रवानी जो थी,
देश पर मर मिटने वालों की कहानी जो थी,
हर हिंदुस्तानी ने बयान की ज़ुबानी जो थी,
माना वो कुछ एक क्षणों की थी,
पर कुर्बानी तो थी।



काश


काश मैं कल होता,
कम-से-कम, इस दुनिया के पापों से तो निश्छल होता,
काश मैं कल होता।

अगर कहीं आग लगती तो काश मैं जल होता,
इस दुनिया से पापों को मिटाने का काश मुझमें बल होता,
काश मैं कल होता।

आज-कल तो चारों तरफ है बुराई,
नहीं है कहीं सच्चाई का नामो-निशान,
लकीन फिर भी रहेगी यही जुस्तजु मेरी,
कि ये दुनिया बन जाए, एक सुंदर जहाँ।
काश मैं कल होता...




गर ऐसा हो तो कैसा हो

हवा में भाप की जगह पानी उड़े तो कैसा हो?
नदियों में पानी की जगह बादल बहें तो कैसा हो?
आसमाँ को बादल की जगह भाप ढके तो कैसा हो?
सयाने को दुनिया पागल कहे तो कैसा हो?
नफरत की जगह मैं प्यार करूँ तो कैसा हो?

खेत में पौधों की जगह इंसान उगें तो कैसा हो?
धरती के चक्कर सूर्य, सूर्य के चक्कर चंद्रमा काटे तो कैसा हो?
महासागर में हीरें बहें तो कैसा हो?
करोड़ों कोयलों में पानी की एक बूंद मिले तो कैसा हो?
ज़मीन पे चलने के बजाए मैं उड़ूँ तो कैसा हो?
हाथ मिलाने के बजाए गले मिलूँ तो कैसा हो?

मेरी सोच पे पाबंध ना हो तो कैसा हो?
हम युद्ध ना लड़ें तो कैसा हो?
स्त्री और पुरुष का बराबर दर्ज़ा हो तो कैसा हो?
धर्म के नाम पे कत्ल ना हो तो कैसा हो?
ये संसार एक शांतिपूर्ण जगह हो तो कैसा हो?
सब अक्सर उदास की जगह ज़्यादातर खुश रहें तो कैसा हो?

हवा में भाप की जगह पानी उड़े तो कैसा हो?

काल


ऐ माँ, अब तेरे आग़ोश में मैं समाए जा रहा हूँ,
पर तेरे कर्ज़ का ये सिला मैं तुझे दिये जा रहा हूँ,
के खून से अपने धो दिया है मैंने वो पथ,
जिस पर चले थे माँ तेरे दुश्मनों के रथ,
तेरे लिए मैं जान भी अपनी कुर्बान किए जा रहा हूँ,
ऐ माँ, तेरे आग़ोश में मैं समाए जा रहा हूँ।

अब और ना देखी जाए मुझसे ये जंग,
जो खेलती है ना सिर्फ औरतों के सुहागों के संग,
पर ये करती भी है कई बच्चों को अनाथ,
बिछुड़ जाता है उनसे उनके माँ-बाप का साथ,
ऐ ख़ुदा दे मोक्ष मुझे, ये ही उम्मीद लिए जा रहा हूँ,
ऐ माँ, तेरे आग़ोश में मैं समाए जा रहा हूँ।

पर-दर-पल मैं महसूस कर रहा हूँ अब और भी तन्हा,
अब लेने जा रहा हूँ भगवान की पनाह,
आशा करता हूँ, हो ये मेरा जन्म आखरी,
इस मोह-जाल से मेरा अंत हो,

देख परछाईं काल की।

कारगिल



वो चले जब सीना तान के,
बिना डरे अंजाम से,
आँखों के सामने छाया अंधेरा,
जब दुश्मनों ने उन्हें था घेरा,
उस पल दिखी के तस्वीर सामने,
वो बढ़े उसको थामने,
वो माँ के पाँव थे जो थी उनकी आखरी मंज़िल,
उनके साँसों की खुशबू से आज भी महके है कारगिल।


कसोल

दिल्ली के मैदानों से एक परिंदा उड़ते-उड़ते,
जा पहुंचा कसोल, पार्वती की गोद में,
खुला आसमान था वहाँ और फूलों से भरीं थीं घाटियाँ,
रात को घरों में टिमटिमाती थी बातियाँ,
तपते थे संत वहाँ और घूमते थे सन्यासी,
भटकते थे बंजारे वहाँ और मिलते थे बाबाजी,
थोड़े दिन गुज़ारे उस परिंदे ने वहाँ,
पर फिर लौट गया वहीं उसका घर था जहाँ,
पर मन ना लगता था अपने घर में उसका,
बार-बार याद आता था वो पहाड़ी रस्ता,
तो एक दिन सब छोड़ के वो निकल पड़ा कसोल के लिए,
उस दिव्य वातावरण और सम्मोहिक महौल के लिए,
इस बार वो वहीं का होने चला था,
उस मिट्टी को माथे पे मलने चला था,
और अंतर-ज्योति में रमने चला था,
वो बरसों घूमा वहाँ पर्वतों से लेके नदियों में,
उसने उतना जहां देखा जो कोई देखता है सदियों में,
कोई पूछता उससे ज़िंदगी का सार क्या है,
कोई पूछता उससे ऊपरवाले का आधार क्या है,
तो कोई पूछता धन बटोरने का जुगाड़ क्या है,
पर वो चलता रहता बेसुध अपनी मौज में,
वो बढ़ता रहता अपनी धुन में, अपने मौन में,
वो तपता रहता हर मौसम में, हर आलम में,
और वो अंत में कामयाब हुआ अपनी खोज में...

सुना है मैंने वादियों से,
और हिमालय की ऊंचाइयों से,
और पार्वती की गहराईयों से,
के मिलता है मोक्ष उन्हें,
जो करते हैं तप कसोल के सरग़ोश में,
दिल्ली के मैदानों से एक परिंदा उड़ते-उड़ते,

जा पहुंचा कसोल, पार्वती की गोद में।