Thursday, September 29, 2016

हिन्दुस्तानी

हिन्दुस्तानी

मिट्टी में मिल गए वो लेकिन माँ के चरणों में वो बस गए,
अपनी मातृ-भूमि के लिए उन्होनें दुख हँस-हँस के सहे,
मिट्टी में मिल गए वो लेकिन माँ के चरणों में वो बस गए।

दी अनेक कुर्बानियाँ, कहती है कई कहानियाँ,
आज़ाद वो पैदा हुए थे, आज़ाद ही वो मर गए,
मिट्टी में मिल गए वो लेकिन माँ के चरणों में वो बस गए।

मौक़ा मिली था उन्हें अपनी जान लुटाने का,
मौक़ा मिला था उन्हें शहीद कहलाने का,
मौक़ा मिला था उन्हें देश को आज़ाद कराने के,
देश के ख़ातिर वो शहीद हो कर, सदा के लिए अमर बन गए,
मिट्टी में मिल गए वो लेकिन माँ के चरणों में वो बस गए।

मन में उनके आरज़ू थी के कर वो कुछ दिखलाएंगे,
बाँध के सर पे कफ़न वो मौत को गले लगाएंगे,
वो लिख गए भविष्य हमारा,
अपना वर्तमान हम खुद बनाएँगे,
वो कर गए कर्म अपना,
कर्मवीर वो कहलाएंगे,
अपने लहू से माँ का आँचल वो लाल रंग का रंग गए,
मिट्टी में मिल गए वो लेकिन माँ के चरणों में वो बस गए।




सपनों की खरीद फरोख

आँखों से निकाल के हम अपने सपने बेचने जा रहे हैं,
सुना है बाज़ार में सपने आज कल ख़ूब बिकते हैं,
सुना है बाज़ार में सपनों के दाम बहुत अच्छे मिलते हैं,
आँखों से निकाल के हम अपने सपने बेचने जा रहे हैं ।

सपना अच्छी नौकरी का हो या सपना अच्छे घर का,
सपना अच्छे दोस्तों का हो या सपना अच्छे परिवार का,
सपना अच्छे स्वास्थ का हो या सपना अच्छे जीवन का, 
सपना जितना ज़रूरी होगा आपकी खुशी के लिए,
बाज़ार में उतनी ऊंची बोली लगेगी,
सपना जितना ज़रूरी होगा आपके ज़िंदा रहने के लिए,
बाज़ार में उतने अच्छे दाम मिलेंगे,
आँखों से निकाल के हम अपने सपने बेचने जा रहे हैं, 
सुना है बाज़ार में सपनों के दाम बहुत अच्छे मिलते हैं ।

सपने बेच के जो पैसा बनेगा उससे हम झूठे सपने खरीदेंगे,
ऐसे सपने जो हमारे लिए ज़रूरी नहीं,
ऐसे सपने जो हमारी आँखों में दूसरों ने डालें हैं,
ऐसी सपने जो उन दूसरों की आँखों में तीसरों ने डाले थे,
ऐसे सपने जिन्हें देखते समय हमारी धड़कनें तेज़ नहीं होती,
ऐसे सपने जिनके स्मरण-भर से हमें बेइंतहां खुशी नहीं होती,
हम बाज़ार में अपने सरल, मासूम, सच्चे सपने बेच उसके बदले झूठ से सजे-धजे सपने खरीद के लाएँगे,
उन सपनों की पट्टी आँखों में पहन के फिर उनही से दुनिया देखने लग जाएंगे,
पैसा, शौहरत, ऐयाशी, बईमानी के सपने आज कल बाज़ार में बहुत सस्ते दाम में मिलते हैं,
इन झूठे सपनों को पाने के लिए दुनिया को काटना पड़ता है, ये काम आसान है,
अपने सच्चे सपनों को पाने के लिए खुद संघर्ष करना पड़ता है, वो काम बेहद मुश्किल,
इसीलिए हम आसान राह ही अपनाएँगे,
हम आँखों से निकाल के अपने सपने बाज़ार में बेच आएंगे, 

सुना है बाज़ार में सपनों के दाम बहुत अच्छे मिलते हैं । 

विदाई


यह कविता हर उस विदाई के उपलक्ष पर लिखी गयी है जो हम ज़िंदगी में अपने प्रियजनों से लेते हैं, चाहे वो स्कूल से हो, कॉलेज से, नौकरी से या खुद ज़िंदगी से ।

इस समंदर के गुज़र,
माना न पहुंचे अपनी नज़र,
पर इन गुज़रते क्षणों को गर हम अपनी पल्कों पे संजोएँ,
फिर यूँ ही, खिलते रहेंगे गुलिस्ताँ, सजती रहेंगी महफ़िलें,
चलते रहेंगे कारवां, बनते रहेंगे काफ़िले, आती रहेंगी मंज़िलें,
सिर्फ हमें चलना है, मन में साहस, दिल में दृढ़ता और आँखों में आशा की जोत लिए ।

शायद, अब कभी ज़िंदगी में मुलाक़ात हो न हो,
इस राह कर हर मोड़, खुशियों की सौगात हो न हो,
ये माना, के हर क़दम पर ज़िंदगी एक इम्तहान होगी,
तभी तो, यहाँ जो हमनें सीखा, जो पाया,
उससे हर मुश्किल को जीत लेने में ही हमारी शान होगी,
कुछ धोखे भी होंगे और कुछ छल भी मिलेंगे,
क्योंकि दुनिया में बहुत मिल जाते हैं, झूठ बोलकर दिल लुभाने वाले,
पर ऐसे बहुत कम हैं, जो हमारे भले के लिए हमसे सच बोलते हैं,
वो ही हैं हमारी ज़िंदगी बनाने वाले ।
ये आशा है मेरी, के आप ज़िंदगी में आगे बढ़ें, उन्नति करें,
और कभी भी कुछ अप्रिय हो, तो ये ज्ञान, ये तहज़ीब, ये सम्मान,
जो आपको इस विध्यालय ने दिया है, इसे याद करें,
और ये वादा है मेरा,
के आप अपनी और दूसरों की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे,
क्योंकि हम वो पौधा नहीं जिसे पतझड़ सूखा दे,
और जो हमें हिला दे न कोई ऐसा बारूद है,
क्यों, क्योंकि हमारी नींव मज़बूत है ।

और अंत में, आपसे ये ही कहना है,
कि इस साथ में, आप सबकी होंगी कुछ मीठी तो कुछ खट्टी यादें,
पर आज, इन रेत से लम्हों को पानी समझ मुठ्ठी में समेट लो,
और आगे फिर कभी जब यादों कि ये गठरी खुलेगी,
तो ये दावा है मेरा, के पानी की जगह इस सीप में मोती मिलेंगे,
जिनकी रोशनी के मुक़ाबले में, हर ग़म की रात,
कोई भी हो अप्रिय बात,
चाहे जैसी भी हो कड़वी याद,
धीमी पड़ेगी, चाँदनी से धुलती दिखेगी ।  




भोर

आसमान की हांडी में,
एक कटोरी रात उबाल लो,
फिर तारों और ग्रहों का तड़का बादलों की ग्रेवी में बनाके रात में डाल दो,
अमावस से लेकर पूर्णिमा तक की चाँद की फांक काट लो,
फिर स्वादानुसार उसे भी रात में डाल दो,
इस घोल को आठ घंटे सूरज की हल्की आंच पे रखो,
तो एक नारंगी भोर तैयार होगी,
वो थोड़ी-सी गरम, थोड़ी-सी ठंडी होगी,
उस भोर को चखो, वो ज़िंदगी की भोर है,
उसके स्वाद का मज़ा ही और है,
जीवन के हर दिन की गर शुरुवात ऐसी हो तो ज़िंदगी गुलज़ार हो ।

आसमान की हांडी में एक कटोरी रात उबाल लो । 

बिल्डर से बातचीत

एक बिल्डर से मिलने गए थे आज मैं और मेरी पत्नी, 
पूछना था क्या बादलों पे घर बनाते हो, 
ठहरे बादलों की नींव रखते हो या तैरते बादलों पे इमारते उगाते हो, 
उसने कहा बादलों का आज कल कोई भरोसा नहीं, वो हवा के जैसे आवारा हो गए हैं, 
कोई ज़माना था जब वो धीरे चलते थे अब ब्रह्मपुत्र की धारा हो गए हैं, 
जे.सी.बी में बादल, पत्थर और ओज़ोन घोलो, उसमें कार्बन और नाइट्रोजन मिलाओ, 
और जमे पानी की नींव पे ऊंची ऊंची बिल्डिंगें बनाओ, 
मैंने कहा प्रक्रिया नहीं, ये बताओ कौनसी मंज़िल का घर खाली है, 
कब तक कमप्लीशन होगा, कब की मूव-इन की तैयारी है, 
कहता अभी तो बस सबसे ऊपर का फ्लैट ही बचा है, 
अन्तरिक्ष बगल में है ना, इसीलिए कोई ना उसे लेता है, 
पत्नी ने कहा बड़े साहिब, अन्तरिक्ष बगल में है ये तो बहुत अच्छी बात है, 
दिन भर धूप सेकेंगे फिर रात, तारों को निकट से देखेंगे, 
बिल्डर भड़क उठा, कहा मैडम असल तो आपको पता नहीं, 
पुच्छलतारे का लगता है आपने कभी कूड़ा साफ किया नहीं, 
अन्तरिक्ष के पास घर लोगे तो दिन में भभकती गर्मी और रात को थड़थड़ाती सर्दी होगी, 
बादल उबाल उबाल पानी पीना पड़ेगा, 
और आपके लिए रोज़-दर-रोज़ हवा का इंतजाम कौन करेगा, 
मैंने कहा, शांत भ्राता, वो बात आपकी सही है, 
पर अन्तरिक्ष जैसे मोबाइल सिग्नल कहीं आते नहीं है, 
सोचो इंटरनेट की क्या ज़बरदस्त स्पीड होगी, 
वौटसएप, फेस्बूक तो दौड़ेगा, 
स्काईप पक्का क्रैश होगा और मूवीस पलों में डाउनलोड होंगी । 
बिल्डर ने शांत स्वभाव में फिर कहा के अन्तरिक्ष के इतने पास होने के बावजूद अगर आप चाँद नहीं मोबाइल देखोगे, 
तो ये फ्लैट आपके लिए नहीं है, फिर ना पूछना कब बेचोगे ।

प्यार का आंशियाँ

मुझे प्यार का आशियाँ मिलना मुश्किल लगता है,
मैं जिस किसी से बात करूँ उसकी आँखों में अपने लिए प्यार पढ़ना मुश्किल लगता है,
यूं तो कुछ दिन कर लेता हूँ गुफ़्तु-गु उनसे,
पर शब्दों के पुलिंदों से दिलों के रास्ते जोड़ना मुश्किल लगता है।

मैं बेहद इश्क़ करना चाहता हूँ,
मैं किसी पे मारना चाहता हूँ,
मैं राँझा, रोमियो, फरहाद बनना चाहता हूँ,
मैं ये बात बेबाक करना चाहता हूँ,
पर किसी से अपना ये जुनून बयां करूँ तो कहते हैं,
तुम बेवकूफ, नासमझ, बेपरवाह समझते हो हमें जो ऐसी बातें कहते हो,
आज के ज़माने में किसी को ऐसा प्यार नहीं होता,
आज के ज़माने में ऐसा खुमार, ऐसा गुबार नहीं होता,
तुम अपनी असलियत पे आओ,
दहेज कितना चाहिए ये बताओ,
शादी करो, बच्चे करो, ज़िंदगी बिताओ,
ये प्यार-व्यार के चक्कर को भूल जाओ,
हर बार जब ये होता है तो फिर से निकलता हूँ सच्चे प्यार की खोज में,
हर बार सोचता हूँ वो एक लौता मिलने में वक़्त लगता है,

पर अब जाने क्यूँ मुझे प्यार का आशियाँ मिलना मुश्किल लगता है। 

नाश

नाश


ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था,
जब टूट गया था हर बंधन, हर रिश्ता, हर नाता,
ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था।
उन पलों की याद से दहलती ये ज़मीन, ये आसमां,
ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था।

हर साँस तब शोक में डूबी हुई पुकार थी,
इंसान-इंसान का दुश्मन था, हर हाथ में तलवार थी,
दिल में नफरत की खड़ी एक अनदेखी दीवार थी,
जीते हिन्दू या मुसलमान वो इंसानियत की हार थी,
खून की नदियाँ बहीं पर किसी को उससे वास्ता क्या था,
ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था।

गगन पे भी नफरत के बादल छाए थे चारों पहर,
हर साँस से था पूछा जाए, उसका धर्म, उसका शहर,
भारत के थे दो टुकड़े हुए,
हिंदुस्तान और पाकिस्तान,

ऐ विधि तेरे विधान में एक ऐसा हादसा भी था।